बाबा आमटे एक समय धनाड्यों में गिने जाते थे ,वे चीते की खाल से ढकी कुर्सी वाली जीप में बैठ कर शिकार खेलने जाते थे ..उन्होंने वकालत की पढाई भी की ..कुछ समय बाद वे अपना सब कुछ भूल कर दलितों के साथ उन्हीं की बस्ती में रहने लगे..संतुष्टि न मिलने पर उन्होंने मैला ढोने जैसा काम भी किया ..एक बार तेज बारिश हो रही थी और वे मैला ढोने वाली गाड़ी जिसमे से बहुत बुरी गंध आ रही थी , ले कर जा रहे थे ,तभी उन्हें सड़क के किनारे किसी के कराहने की आवाज आई ...जा कर देखने पर पता चला की एक परिवार द्वारा त्यक्त व्यक्ति जिसे कोढ़ था दयनीय हालत में पड़ा हुआ था ...उसके शरीर से आने वाली गंध इतनी तीक्ष्ण थी की बाबा जो मैला ले कर जा रहे थे ,से भी बर्दाश्त नहीं हुई और वे उसे केवल कपडा ओढा कर आगे बढ़ गए...यह घटना भुलाना बाबा के लिए बहुत मुश्किल हो गया ..पढ़ें (http://mss.niya.org/people/baba3_amte.php
इसके बाद बाबा ने कुष्ट एवं अक्षम लोगों के लिए आश्रम खोले और जीवन पर्यंत उनकी सेवा की ..
मेरी समझ से ,जब बाबा को ये लगा होगा की "मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है" तभी से उन्होंने राजसी जीवन का त्याग किया होगा ...पर मूल उद्देश्य जिसके लिए शायद वे जाना चाह रहे होंगे शायद उस घटना के बाद ही मिला होगा..
इस चर्चा का उद्देश्य ये नहीं है की आप यहाँ से प्रेरणा लें ..मै तो केवल ये ही कहना चाह ता था की मनुष्य का जीवन बहुत लम्बा नहीं होता ,अतः जितनी जल्दी हो सके स्वयं को पाने की कोशिश शुरू करनी चाहिए ,,और रही प्रेरणा की बात तो मै तो यही सोचता हूँ की महापुरषों की जीवनी पढ़ कर उन्ही के सामान आचरण करना हो सकता है की किसी भावी महापुरुष का अंत हो .... :-)
ये तो थी मेरी वाली अब अप बोलो ,आप क्या बोलते हो ,,अरे बोलोगे तभी तो होगी न
अपनी वाली
काफी कुछ अभिव्यक्त करता है बाबा आमटे को लेकर लिखा गया आपका ये लेख/ आपने बिलकुल सही लिखा की "महापुरुषों की जीवनी से प्रेरणा लेना किसी भावी महापुरुष का अंत हो" खूब कहा है साहब/ वाह
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ReplyDeleteWah...aap to guru hain,main to aapki baat se sahmat hu or jaha tak meri samajh hai or v logo apke samrthak honge .
ReplyDeleteapke bhakt ke taraf se charan sparsh...